रविवार, 4 अक्टूबर 2009

मेरी त्रिलोकपुर यात्रा

26 सितंबर को त्रिलोकपुर में था। यह सिरमौर जिले (हिमाचल प्रदेश) का कस्‍बा है। वहां मां बाला सुंदरी शक्‍तिपीठ है। पूरे परिवार के साथ उनकी पूजा अर्चना करनी थी। सुबह 6:50 बजे ही वहां दस्‍तक दे दी। मौसम खराब था। बूंदाबांदी हो रही थी। खड्ड (स्‍थानीय लोग त्रिलोपुर नदी भी कहते हैं) में पानी बहुत कम था। वहां तैनात ट्रैफिक पुलिस वालों को पूरी आशंका थी कि अच्‍छी बारिश होगी और खड्ड में बाढ़ आएगी। सो उन्‍होंने हमारी गाड़ी को सड़क किनारे खड्ड में बनी पार्किंग की ओर घुमा दिया। इसमें 20-30 गाडि़यां खड़ी थीं। पानी बिल्‍कुल नहीं था। खड्ड के बीच में आधेक फुट पानी था। दूसरे किनारे पर दूर से दातुन करते लग रहे पुलिस कर्मचारी ने गाड़ी को आगे बुला लिया और वहां बनी दूसरी पार्किंग की तरफ अपना हाथ फेंक दिया। इससे पहले सड़क किनारे खड़े दो ट्रैफिक पुलिस कर्मचारियों ने मेरे आग्रह करने के बावजूद गाड़ी को मंदिर के पास नहीं जाने दिया। बोले-वहां जाने के लिए खड्ड पार करनी पड़ेगी, परंतु आज ऐसा करना उचित नहीं होगा। कभी भी पानी का सैलाब आ सकता है। बात मेरी खोपड़ी में घुस गई। खैर गाड़ी खड़ी कर ड्राइवर सहित हम सात व्‍यक्‍ति मंदिर की तरफ चल दिए। रास्‍ते में ड्राइवर कहीं फूट लिया। बाकी लोग 7:30 बजे बाजार में थे। प्रसाद व पूजा सामग्री खरीदी। मैं साथ-साथ पानीपत वाली धर्मशाला के बारे में पूछता जा रहा था। कम से कम 7-8 जगह पूछा होगा, पर सब जगह गलत ही पता चला। अब तक बारिश होने लगी थी। एक दुकानदार का विश्‍वसनीय संकेत मिलते ही मैदान पार कर हम एक अड्डे पर पहुंचे। वह कैथल वाली धर्मशाला थी। हम लोग आधे भीग चुके थे। खैर वहां जाकर बारिश के बंद होने का इंतजार करने लगे। आधा-पौना घंटा आसमान खूब पानी-पानी हुआ। धर्मशाला के सामने आधे भरे सरोवर में बच्‍चे नहा रहे थे। उनको देखकर सोचने लगा कि मैं भी बचपन में, हर मौसम में, गांव में मंदिर वाले तालाब में और कुरुक्षेत्र में सरोवरों में नहाया करता था। शेख चिल्‍ली के मकबरे के पास स्‍थित शिव मंदिर के, जहां अर्जुन ने कठोर तपस्‍या कर भगवान शिव से पशुपास्‍त्र हासिल किया था, सरोवर में तो रैलिंग से कूद गया था और पानी में फर्श के साथ-साथ मछली की भांति तैर रहे छोटे भाई भूपेंद्र सिंह की नाक टूट गई थी। वे भी क्‍या दिन थे। खैर बारिश कम होने पर सभी अपने सिरों पर प्‍लास्‍टिक की पन्‍नियां लेकर मंदिर की तरफ चल पड़े। मैं पीछे-पीछे चल रहा था। इस बार दुकानदारों से नहीं पूछना चाहता था। लगता है वहां मेले में काफी दुकानदार बाहर के थे, सो उनको अधिक मालूम नहीं था। पुलिस वाले दिख नहीं रहे थे कि उन्‍हीं से ही पूछ लिया जाए। चलते-चलते पता ही नहीं चला कि मंदिर कब आ गया। 10 बज रहे थे। बारिश अभी-अभी बंद हुई थी। श्रद्धालुओं की लाइन खाली थी। सो जल्‍दी जल्‍दी मुख्‍य मंदिर परिसर में पहुंच गए। वहां लंबी लाइन थी। 30 मिनट में ही मां के दर्शन हो गए। वहां का वातावरण बहुत शांत, शीतल है। सामने हरा पहाड़। वहां एक कार्नर में तीन भक्‍त ढोलक आदि बजा रहे थे। पल भर में वहां एक बुजुर्ग आ गया। नाचने लगा। मैंने भी अपना कैमरा झट से उस पर तान दिया। उसके पांव धीरे-धीरे धमक पर उठ रहे थे। मैं भी धड़ाधड़ फोटो उतारने लगा। बूंदाबांदी फिर शुरू हो चुकी थी। मेरा मन चाह रहा था कि वहां रुका जाए। शांत माहौल की शीतलता ग्रहण की जाए। बढ़ती बारिश को देखकर पिता जी के टोकाटोकी करने पर मेरी एक न चली। खैर मंदिर के पिछवाड़े एग्‍िजट प्‍वाइंट से नीचे उतर गए। सामने पानीपत वाली धर्मशाला थी, जिसके उपप्रबंधक ने देवी मां के दर्शन जल्‍दी कराने का भरोसा दिलाया था। भूपेंद्र बोला-याद कर, यह वहीं धर्मशाला है। बचपन में इसमें ठहरे थे। आठम् से पहले वाली रात में ही गांव से आ गए थे। मां सुनाने लगी-बाहर ही ईंटों का चूल्‍हा बनाकर खाना तैयार किया था। अगले दिन पूजा आदि कर, मेले में घूम-फिरकर चले गए थे अपने गांव राजौंद। यह पंजाब से अलग हुए हरियाणा के सबसे बड़े 2-3 गांवों में शुमार है और इसका इतिहास सैकड़ों बरस पुराना है।
खड्ड में तांडव - बारिश, और पीछे से आ रहे पानी के कारण त्रिलोकपुर नदी में बाढ़ आ गई। जानी नुकसान होने से बच गया, लेकिन खड्ड की पार्किंग में खड़ी कारें देखते ही देखते बह गईं। एक-दो घंटे की मशक्‍कत के बाद 7-8 कारें तो आधे से डेढ़ किलोमीटर के दायरे में मिल गईं, मगर शेष कारें उस दिन नहीं मिलीं। कई कारें नदी में उल्‍टी पड़ी थीं। कई के शीशे टूट गए थे। नुकसान कम होता यदि वाहनों के ड्राइवर मौके पर होते। कई ड्राइवर तो मेले में घूम रहे थे। हमारी वाली पार्किंग के सारे वाहन बच गए। पानीपत का एक परिवार दो दिन पहले ही नई कार खरीद कर लाया था। वह भी नदी में बह गई। अगले दिन के अखबारों दिव्‍य हिमाचल और जनसत्‍ता में हादसे की खबर पढ़ने को मिली। इसमें बताया गया था कि मेला प्रबंधक तड़के 3 बजे से मुनादी करवा रहा था कि मौसम खराब है। खड्ड में कभी भी भारी पानी आ सकता है। मगर सोचने वाली बात है कि जब ऐसा है तो वे दो ट्रैफिक पुलिस कर्मचारी क्‍या रहे थे, जिनके सामने ही खड्ड में किनारे पर (अथवा श्रद्धालुओं द्वारा जबरन बना दी गई पार्किंग)वाहन खड़े किए जा रहे थे।
दो महिलाएं - मां के दर्शनों के बाद मंदिर के पिछली तरफ से बाजार से गुजर रहे थे तो वहां दो हट्टी-कट्टी महिलाएं घूम रही थीं, जिन्‍होंने अपने जंफर ऊपर चढ़ाए हुए थे। उनकी गिद्ध दृष्‍टि अपने शिकारों को ताड़ रही थीं। वे दूर से ही आ रहे ऐसे बच्‍चों को ताड़ लेतीं, जिनके साथ उनके कमाऊ घरवाले होते अथवा ऐसे लड़कों पर जिनको धर्म-कर्म की मोटी मोटी बातें भी नहीं मालूम होतीं। शिकारों के पास आते ही वे झट से उनके गले में मौली से बनी माला डाल देतीं और उन पर शुभवचनों की भारी भावनात्‍मक बारिश कर देतीं। वे देवी मां की कृपा की बात भी कहतीं। इतने में शिकार ठंडा पड़ जाता और 5 से लेकर 15 रुपये तक उनकी ओर बढ़ा देता। वह भी बिना किसी तनाव के, हंसते हुए। जो नहीं मानता, वे उसे देवी मां का भय दिखातीं। अनुमान है कि वे इस तरह से दिन में 500-700 रुपये कमा लेती हैं। दोनों महिलाओं के इस अधार्मिक खेल को देखकर मैं काफी देर तक हंसता रहा। भूपेंद्र के होंठों पर भी मुस्‍कान तैर रही थी।

गुरुवार, 5 फ़रवरी 2009

जानलेवा लापरवाही

जिस महकमे पर रेल मंत्री लालू प्रसाद याद को नाज था, उस पर वह अब शायद ही कर पाएं। वह इस सचाई को अनदेखा कर रहे थे कि मोटे मुनाफ की पटरी पर मौत भी साथ साथ दौड रही है, जिस पर शिकंजा कसना बेहद जरूरी है। जिस 20 लाख करोड के मुनाफे की गठरी बांधे वह कैंब्रिज, स्‍टेंनफोर्ड, आईआईएम जैसे उच्‍च प्रष्‍ितठित विश्‍वविदालयों व संस्‍थानों के बच्‍चों को मैनेजमेंट के गुर सिखा रहे थे, अपने देश की रेल पटरियों पर वे तेज हवा में उडे जा रहे थे। अभी चार दिन पहले फिरोजपुर जिले के हराज गांव के अनमैंड रेलवे क्रासिंग पर स्‍कूली बस के रेल इंजन की चपेट में आ जाने के कारण चार बच्‍चों की मौत हो गई थी। डेढ साल पहले भी फिरोजपुर मोगा रेल मार्ग पर, नया चूहडचक्‍क गांव में अनमैंड रेलवे क्रासिंग पर स्‍कूली बस टरेन की चपेट में आकर महकमे के चेहरे पर कालिख पोत गई थी। ऐसे हादसे सबक दे जाते हैं, परंतु उनको जब तक गंभीरतापूर्वक अमल में नहीं लाया जाता, तब तक बात नहीं बनेगी। ताजा हादसे के िलए जहां रेलवे की कोताही िमम्‍ेदार है, वहीं डराइवर की लापरवाही भी सभी के दिमागों में खल रही है। आिखर क्‍यों हम इस भ्रम में ठहर जाते हैं कि जो भाग्‍य में लिखा होगा, वही होगा। मगर इसका मतलब यह कतई नहीं िक लापरवाही सफल होने जा रहे कार्य का रास्‍ता बुरी तरह बाधित कर दे और नामामयाबी नसीब में लिख दे। यह भी समझ से परे हैं िक पंजाब में, और पूरे फिरोजपुर रेलमंडल में काफी रेलवे फाटकों पर कोई कर्मचारी तैनात ही नहीं है। क्‍यों। क्‍या रेलवे अपने पल्‍ले से पैसे देता है। क्‍या वह मानवरहित रेलवे क्रासिंग पर कर्मचारी तैनात नहीं कर सकता। क्‍या करेगा वह मोटा मुनाफे से तिजोरियां भरकर। रही बात डीएवी स्‍कूल की। यदि यह कायदे कानून पर चलता तो ऐसा हादसा शायद ही होता। अब बात पटियाला राजिंदरा अस्‍पताल हादसे की, जहां की फोटोथेरेपी यूनिट में आग लग जाने के कारण पांच नवजात बच्‍चों की मौत हो गई। वे चिल्‍लाते रहे, मगर मदद के लिए उनके हलक से फूटती आवाज डयूटी पर सो रहे डाक्‍टरों व पैरामेडिकल स्‍टाफ की नींद नहीं तोड सकी। हे भगवान। नवजात बच्‍चों ने उनको उनकी जिम्‍मेदारी का एहसास कराने की भरसक कोशिश की थी, लेकिन वे अपनी नींद में दैवीय अथवा मानवीय खलल बर्दाश्‍त नहीं करना चाहते थे। दैवीय इसलिए की बच्‍चे भगवान का रूप होते हैं। डाक्‍टर व नर्सें क्‍यों नहीं समझ पाए कि वे कितनी संवेदनशील डयूटी कर रहे हैं, जिसमें थोडी सी भी लापरवाही भयानक नतीजे दे सकती है। फिर इतने ज्‍यादा पढे लिखे लोगों के होने का क्‍या लाभ, जिन पर लापरवाही हावी रहती हो। और यदि अस्‍पताल प्रशासन का निक्‍कमापन है तो उसके खिलाफ भी कडे कानूनों के तहत मुकदमा क्‍यों न चलाया जाए। इस मामले में सरकार भी कम जिम्‍मेदार नहीं है, जिसने अस्‍पताल प्रशासन की 100 करोड रुपये की मांग पूरी नहीं की थी। आखिर क्‍यों अस्‍पताल में 20 साल पुरानी फोटोथेरेपी यूनिटों से काम चलाया जा रहा है। अच्‍छा होता यदि वे सरकार से आर्थिक मदद नहीं मिलने पर एक तख्‍ती राजिंदरा अस्‍पताल पर टांग देते, जिस पर साफ शब्‍दों में लिखा होता कि यहां पीलियाग्रस्‍त, सांस व समय पर पहले जन्‍मे बच्‍चों के इलाज की पुख्‍ता व्‍यवस्‍था नहीं है। ऐसा बोलने का साहस लोगों में बहुत कम रह गया है। ऐसे लोग बहुत कम हैं, जो अपने कार्य को धर्म मानकर, अंतिम मानकर बेहद संजीदगी से करते हैं, बिल्‍कुल सैन्‍य अभियान की तरह, जिसमें सफलता व नुकसान की दर काफी कम होती है। हे भगवान लापरवाह लोगों को जगाए।